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अबु सलेम को फाँसी नहीं मिली

24 साल बाद 1993 मुम्बई ब्लास्ट का फैसला आया।इस बम ब्लास्ट में 257 लोग मारे गए थे और 700 गंभीर रूप से जख्मी हुए थे। इस केस का मास्टर माईंड अबु सलेम को प्रत्यार्पण संधि के तहत पुर्तगाल से भारत लाया गया था। पुर्तगाल ने शर्त रखी थी कि अबु सलेम को भारतीय कानून फांसी की सज़ा नहीं देगा। और हुआ भी ऐसा ही। 24 साल पहले ही पता था कि अबु सलेम मुम्बई ब्लास्ट का शातिर अपराधी है तभी तो पुर्तगाल ने शर्त लगाई।अबु सलेम को आजीवन कारावास की सज़ा मिली है। 24 साल से जेल में है ही, हो सकता है अब उसकी रिहाई भी हो जाय।ताहिर मर्चेंट और फ़िरोज़ खान को फाँसी की सज़ा मिली है और करीमुल्लाह खान को दस साल की सज़ा मिली है। चलो सज़ा तो मिली 24 साल बाद ही। भारतीय कानून व्यवस्था फांसी से पहले जीने के लिए एक लंबी उम्र देता है और इतना मौका कि शातिर अपराधी राजनैतिक और अन्य तरीकों से खुद को बचा भी ले। फिलहाल अबु सलेम को फांसी नहीं देना अदालत की मज़बूरी थी और ये बहस का मुद्दा भी है। हत्यारे को क्या पुर्तगाल सरकार फाँसी नहीं देती। फाँसी की सज़ा जो मर्चेंट और फ़िरोज़ खान को मिली है क्या अबु सलेम का अपराध उससे कमतर था। इस फैसले से 1993 मुंबई ब्लास्ट का घाव फिर हरा हो गया है। फैसले का स्वागत है। इंसानियत के दुश्मनों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। अबु सलेम अंतर्राष्ट्रीय कानून की बैसाखी से बचा जो कि दुर्भाग्य ही है।