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मधुबनी में लौट रही ज़िन्दगी

मधुबनी का नाम दुनिया के लोग गूगल बाबा की कृपा से जानते हैं। मिथिला पेंटिंग वही है जो मधुबनी पेंटिंग है। अब मधुबनी पेंटिंग के साथ मधुबनी नाटक संभवतः धीरे धीरे हम और आप तक पहुंचने वाला है। ऐसा नहीं है कि मधुबनी सांस्कृतिक रूप से अवचेतन हो गया था बस ज़िन्दगी की आपाधापी में कहीं सो गया था। संगीत नाटक अकादमी की दस्तक से नींद खुली है। रंगकर्मी महेंद्र कर्ण सूत्रधार बने हैं। नाट्य लेखन की कार्यशाला मधुबनी में शुरू हुई है और निश्चित रूप से नाट्य प्रेमियों के लिए ये एक अवसर है , रंगकर्मियों के लिए उत्सव है।इसे महज एक कार्यशाला मैं नहीं समझता। इससे जो बीजारोपण होगा वो वृक्ष बनेगा और आनेवाली पीढियां मंच को ज़िन्दगी से जोड़कर देखेंगी। मनोरंजन ड्राइंग रूम ने निकलकर मंच तक आयेगा और सिनेमा हॉल तक नहीं जानेवालों के लिए हर मंच कुछ उत्सव जैसा ही होगा। इतना विश्वास का कारण है वो नाम जो इस नाट्य लेखन कार्यशाला से जुड़े हैं। अविनाश चंद्र मिश्र सर का खुद का नाटक संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत और मंचित है। हमारे भी शिक्षक रहे हैं अविनाश सर। कम बोलते हैं और कमाल का बोलते हैं ।नाट्य विधा की बारीकियों को इनसे सुनना रंगकर्मी बना देने के लिए काफी है। मलंगिया सर वहां है और उनका नाट्य लेखन का अनुभव नाटक की ज़िंदा तस्वीर जैसी है।
महेन्द्र मलंगिया स्वयं में नाटक के दस्तावेज हैं , बटुक भाई को कौन नहीं जनता और वरिष्ठ रंगकर्मी प्रेमलताजी का होना कार्यशाला का सम्मान हैं। इतना कुछ समेटने के लिए महेंद्र कर्ण को बधाई और साधुवाद