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एक बार में तीन तलाक अब नहीं

तीन तलाक पर फैसला आ गया। सोशल साइट्स पर औरतों के साथ अधिकांश मर्दों ने इस फैसले का स्वागत किया और बांकियों ने अलग अलग समस्या गिनाकर ये साबित करने की कोशिश की कि सरकार लोगों को वेवकूफ बना रही है , अपनी नाकामी को छिपा रही है। लेकिन तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तलाक, तलाक, तलाक कहकर तलाक लेने की प्रकिया को असंवैधानिक करार कर दिया.

32 साल पहले 1987 में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ही फैसला सुनाया था, जिसने देश की राजनीति को बदल कर रख दिया था. इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया. राजनीतिक बवाल मच गया था. राजीव गांधी सरकार ने एक साल के भीतर मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, (1986) पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था. लेकिन इसबार सरकार द्वारा पहल की गयी और ऐसा माना जाना चाहिए कि एकबार में तीन तलाक की प्रैक्टिस अब मुस्लिम समाज नहीं मानेगा और अब इसकी इज़ाज़त भी नहीं होगी।

राम जेठमलानी, कपिल सिब्बल, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, इंदिरा जयसिंह और अणित सिंह चड्ढा से लेकर एमिकस क्यूरी सलमान ख़ुर्शीद तक जो दलीलें दी गईं उनसे क़ानूनी प्रक्रिया की कई किताबें भरी जा सकती हैं लेकिन अदालत का फैसला सबके सामने है जिसका तमाम मुस्लिम महिलाएं स्वागत कर रही हैं। सिद्दीका बेगम जो शाहबानो की बेटी हैं , ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को औरतों के हित का फैसला कहा हैदेश का कानून लोगों की जीवन शैली में दखल नहीं डालता लेकिन सदियों से चली आ रही गलत परम्परा में हमेशा से सुधार लेन की कोशिश करता रहा है और तीन तलाक के ऊपर उच्चतम न्यायालय का फैसला ऐसा ही फैसला है.